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स्वरचित



"कौन समझता है यहां किसी की बेबसी,
मुस्कराते चेहरे का दर्द किसने देखा है?"  

शायरी पुरानें समय से ही हिन्दुस्तान में काफी प्रचलन में रही है मिर्जा गालिब, मीर तक़ी मीर, बसीम बरेलवी, मुनव्वर राना, राहत इन्दौरी ये शायरी की दुनियां में ऐसे नाम हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं । इन शायरों नें अपनी शायरी, अपनें कलामों के जरिये अपनी आवाज लोगों के दिलों तक पहुंचाई है मिर्जा गाल़िब की एक शायरी मुझे अक्सर याद आ जाती है वो कितना सुंदर लिखते हैं कि 
"उम्र भर गालिब एक ही भूल करता रहा,
धूल चेहरे पर थी और मैं आईना साफ करता रहा"



शायरी का जन्म दिल से होता है जब किसी का दिल किसी से लगता है तो हर चीज हसीन हो जाती है व्यक्ति न चाहते हुए भी शायराना हो जाता है ठीक इसके विपरीत दिल टूटनें पर अपना दर्द बयान करने के लिए शायरी सबसे कारगर साबित होती है । 
जब कभी दिल का सुकून खो जाये जब रातों को नींद नहीं आये,  जब सबके होते हुए भी किसी के होने का होश न रहे तो इंसान निकल पडता हैं खयालों की एक ऐसी दुनियां में जिसकी कोई मंजिल नहीं होती । फिर उस खयालों की दुनिया में कागजों पर कितनें ही ख्वाब उकेर दिये जाते हैं  । आज तक जितने भी शायर हुये हैं वो जरूर आशिक थे इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकेगा । 
खैर ये मेरा पहला ब्लाग हैं अपनी लिखी कुछ शायरियां पेश-ए-खिदमत हैं। 




इस मंच पर आपके लिये खुद की लिखी शायरी उपलब्ध कराऊंगा ।ताकि आप नई नई शायरियों का आनंद ले पाए ।  आशा करता हूँ आप लोगो का भरपूर सहयोग मिलेगा । 



अब जब आ गई है बात तो कुछ चर्चे होनें दे
ऐ दिल ! खामोश रह थोडे अश्क आज बहनें दे...




मैं उफ्फ तक नहीं करुंगा
तुम सारे सितम आजमा कर देख लो...




इतना बेचैन कोई क्यूँ होता है,
नींद आंखो में है फिर क्यूँ नहीं सोता है?



एक ये रात और ये गुजरे इस खयाल में,

एक उम्र हमने अपनी यूं ही गुजारी है...




मुझे तुम पहचान तो लोगे न,

जब बहुत अजनबी हो जाओगे?




उधर जानें किस मुफलिस नें चिराग जलाया है

आंधियों नें आज फिर अजब सी दस्तक दी है । 





क्यूँ न हद से गुजर जाया जाये,

टूटकर फिर क्यूँ न बिखर जाया जाये । 



धडकनों यूं न मचल जाया करो,

कभी उसे भी मेरे नाम से सताया करो।




मैं जंग-ए-इश्क हार कैसे जाऊं,

तुम ही से सीखी है बंदगी मैंने ।




कोई किसी को इतना कैसे चाह सकता है आखिर,

किसी के नाम से ही उसे नफरत हो क्यों नहीं जाती । 




चार दिन में होना है सब मिट्टी,

कौन है जिसे बहुत दूर तक जाना है ।




लगी दिल की तो बुझ जायेगी मगर,

लगी जो चोट दिल पर उसका क्या करें ।




वो दिल अब किस तरह तोडेंगे,

एक एक टुकडे से जिन्होंने खुद को बनाया हो । 



इतनी शिद्दत से तुम्हें चाहा है,

बेवफाई का इल्जाम आखिर कैसे दूँ?




तू समंदर बनें अगर तो  लहर मैं हो जाऊं,

तू सर्द रात हो और मैं ठंडी शाम हो जाऊं ।





बडी बेरहम है जिन्दगी,

तेरी कसम बस जिये जा रहे हैं ।




काश कि मेरा काश यू काश ना होता,

इस काश नें काश तुम्हें मेरा किया होता ।




अपनें दर्द की ना किसी से शिकायत कीजिए,

लोग जालिम हैं मुस्करा देंगे ।

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