"खयालों के पुलिंदे" खयालों के पुलिंदों के बोझ तले दबा यूँ कि दबा रह गया कुछ कीमती, कुछ रद्दी से खुरदरे और दिमाग को वहम से भर देने वाले कुछ सच्चाईयां जिंदगी की मुझे समझानें के लिये गढी गई जानें कितनी गीता और आयतें मेरी सलामती के लिये पढी गईं नापाक रूह थी आखिर कैसे पाक होती मुझसे जुदा होकर जिंदगी क्यों चैन से फिर न सोती मैं तो आदतन बंजारा, बेगाना था रास्तों में उतर कर कहीं फिर गुम हो गया खयालो के पुलिंदों के बोझ तले दबा यूँ कि दबा रह गया कुछ कीमती, कुछ रद्दी से खुरदरे और दिमाग को वहम से भर देने वाले...
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