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स्वरचित



रोज हसरत होती है तुझे कागज पर उतार दूँ
पर अफसोस, बो कागज रोज भीग जाता है...


रात बडी है कोई जख्म ही कुरेद लूँ

तन्हाँ रहकर भी कहाँ वक्त गुजरता है...




मोहब्बत में अच्छे शायर हुये

वैसे कहाँ अल्फाज समझ आते थे...


तेरी उम्मीद के सिवाय मुझे कुछ भी हासिल नहीं
बहुत कर्जदार हो चुका हूँ मैं जमानें का...

पी लिया करता हूँ थोडी सी , शाम में
मुझे रोकनें अब तुम कहां आते हो


पडा रहता हूँ बंद करके दरवाजा एक कोनें में
मेरा हाल पूछनें अब कौन आता है?...

नाकामियों ने इतना समझदार बना दिया
ताउम्र कितावों से क्या  हासिल होता...

कुछ बरबाद सपनें, कुछ सूखे हुये अश्क
मेरी आँखों में इसके सिवा कुछ भी तो नहीं...
शहर में उनके अपनें निशां ढूढता हूँ
इक रोज जहां हमनें आशियां बनाया था...



बसेरा छोड गया परिन्दा कोई फिर से
यकीनन किसी नें उसे जी भर के सताया होगा...



कैसे नीलाम कर दूँ तेरे इश्क की दौलत ?
पूरी जिंदगी यही कमाई है मैंने...



हाँ शरीफ हुआ करते थे कल तक
आज हम सा बेईमान कहाँ मिलता है...


पीना बुरी बला है....
कमवख्त लोग कहते हैं...



ये दिल वीरान है बंजर हो गया हैहो गया ह

बताओ लौटकर इसमें तुम कब आओगे?


होश में आ गए तो बदनाम होंगे कई अपनें
मेरे दोस्त मुझे कुछ तो नशे में रहने दो ।


काश बहल जाता मेरा दिल भी शराब से
तो हम भी यूं तन्हाँ नहीं रहते ।
बताओ !  कितनीं मुद्दत तक तुम्हें और चाहूँ ?
कि तुम बस मेरे हो जाओ...

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